Dehradun. पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब सीधे भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पांचवें दिन फिर बढ़ोतरी ने महंगाई की चिंता और बढ़ा दी है। मंगलवार से दिल्ली में पेट्रोल 98.64 रुपये प्रति लीटर और डीजल 91.58 रुपये प्रति लीटर मिलेगा। इससे पहले शुक्रवार को ही तेल कंपनियों ने दोनों ईंधनों के दाम में तीन-तीन रुपये की बड़ी वृद्धि की थी। अब नई बढ़ोतरी में पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे महंगा हुआ है।
तेल कंपनियों की ओर से देर रात पेट्रोल पंप संचालकों को भेजे गए संदेश ने साफ कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता का असर लगातार जारी रहेगा। पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और वहां युद्ध या तनाव बढ़ने पर कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है।
हालांकि सरकार और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को बढ़ती कीमतों की वजह बता रही हैं, लेकिन आम जनता के लिए इससे राहत नहीं मिलती। पेट्रोल और डीजल केवल वाहन चलाने का साधन नहीं हैं, बल्कि इनकी कीमतें परिवहन, कृषि, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत को भी प्रभावित करती हैं। डीजल महंगा होने का मतलब है कि फल-सब्जियों से लेकर राशन तक सब कुछ महंगा हो सकता है।
मध्यवर्ग और निम्न आय वर्ग पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है। ऐसे में लगातार ईंधन मूल्य वृद्धि आर्थिक दबाव को और बढ़ाएगी। सवाल यह भी उठता है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें घटती हैं, तब उपभोक्ताओं को उसी अनुपात में राहत क्यों नहीं मिलती।
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को टैक्स संरचना पर पुनर्विचार करना चाहिए। पेट्रोल और डीजल पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले कर कीमतों का बड़ा हिस्सा होते हैं। यदि टैक्स में अस्थायी राहत दी जाए तो जनता को कुछ राहत मिल सकती है।
फिलहाल स्थिति यही संकेत दे रही है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट जल्द नहीं थमता, तो आने वाले दिनों में ईंधन के दाम और बढ़ सकते हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल आपूर्ति बनाए रखने की नहीं, बल्कि आम आदमी की आर्थिक चिंता कम करने की भी है।

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