उत्तराखण्ड आज अपनी रजत जयंती मना रहा है। यह सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उस लंबी यात्रा का पड़ाव है जो 2000 में राज्य निर्माण की मांग के साथ शुरू हुई थी। पहाड़ों की दुश्वारियों, उम्मीदों, संघर्षों और विकास के संकल्पों से बुना यह 25 वर्षीय सफर आज नए मूल्यांकन की मांग करता है। उत्तराखण्ड का निर्माण उन अपेक्षाओं के साथ हुआ था कि पहाड़ अपनी जरूरतों के अनुरूप नीतियां बनाएगा, और स्थानीय जीवन की कठिनाइयों को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। 25 वर्षों में राज्य ने निश्चित रूप से कई उपलब्धियों को हासिल किया है, जिनका उल्लेख किया जाना चाहिए, पर इनके बीच भविष्य की चुनौतियों को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। सड़कें किसी भी पर्वतीय राज्य की धमनियाँ होती हैं। इन वर्षों में सड़क निर्माण, पुलों और संपर्क मार्गों के विस्तार ने उत्तराखण्ड को नई गति दी है। चारधाम ऑल-वेदर रोड परियोजना ने तीर्थयात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया है। दुर्गम गांवों तक पहुंच बढ़ी है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक लोगों की पहुँच बेहतर हुई है। केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य ने उत्तराखण्ड को राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक पटल पर नई पहचान दी। आध्यात्मिक और एडवेंचर टूरिज्म दोनों के क्षेत्र में राज्य ने उल्लेखनीय बढ़त हासिल की है। हेलीसेवाओं के विस्तार ने पर्यटन को भविष्य की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनाया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ी है, मेडिकल कॉलेजों का विस्तार हुआ, और आपातकालीन सेवाओं में सुधार हुआ। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि पहाड़ों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, अस्पतालों की सीमाएँ और भौगोलिक कठिनाइयाँ अब भी चुनौती हैं। रजत जयंती का अवसर इन कमियों पर भी गंभीर चिंतन चाहता है। AIIMS ऋषिकेश, IIM काशीपुर और IIT रुड़की की बढ़ी क्षमता जैसे संस्थान राज्य को शिक्षा का केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। स्कूल स्तर पर भी डिजिटल शिक्षा और अवसंरचना के सुधार ने नई पीढ़ी में आत्मविश्वास जगाया है। लेकिन पलायन रोकने के लिए युवाओं को रोजगार के अवसर देना अब भी प्राथमिक चुनौती है। उत्तराखण्ड की अस्मिता उसकी संस्कृति में बसती है। लोकगाथाओं, परिधानों, पर्वों और परम्पराओं को संरक्षित रखने के प्रयास सराहनीय हैं। परंतु इन सांस्कृतिक धरोहरों को बाज़ार और आधुनिकता की भीड़ में जीवित रखना आने वाले वर्षों की बड़ी जिम्मेदारी होगी। केदारनाथ त्रासदी ने राज्य को गहरी सीख दी। आज उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन में कहीं अधिक तैयार, सुसंगठित और वैज्ञानिक रूप से सक्षम है। SDRF का सुदृढ़ीकरण और तकनीकी उपकरणों का उपयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। रजत जयंती एक उत्सव है, पर इसके साथ यह चेतावनी भी कि अगला पड़ाव सिर्फ उपलब्धियों का नहीं, बल्कि दूरदर्शिता का होना चाहिए। राज्य को अब हरित ऊर्जा, जल संरक्षण, तकनीक आधारित पहाड़ी कृषि, और पर्यटन के जिम्मेदार मॉडल पर गंभीरता से काम करना होगा। पलायन रोकने, पर्वतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और युवाओं को अवसर देने के लिए ठोस नीति आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 25 वर्ष किसी राज्य की उम्र में बहुत नहीं होते, पर उतने कम भी नहीं कि अनुभव न मिल सके। उत्तराखण्ड ने इन वर्षों में उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों का स्वाद चखा है। रजत जयंती एक सितारे की तरह चमकती है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि आने वाले 25 वर्ष राज्य को स्वर्णिम भविष्य की ओर कैसे ले जाते हैं।

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