विवेक बनियाल (स्वतंत्र पत्रकार)
बैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु और शिव की पूजा एक साथ की जाती है, जिसे हरि-हर मिलन कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने वाराणसी में एक हजार कमल फूलों से भगवान शिव की पूजा की थी, और जब एक फूल कम पड़ गया तो उन्होंने अपनी आँख अर्पित कर दी, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें बैकुंठ लोक का अधिपति बनने का आशीर्वाद दिया। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से भक्तों को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।

महत्व और पौराणिक मेला :
उत्तराखंड के श्रीनगर गढ़वाल में मनाया जाने वाला बैकुंठ चतुर्दशी मेला यहां की प्राचीन परंपरा, आस्था और लोक संस्कृति का एक जीवंत उदाहरण है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आयोजित होने वाला यह पर्व भगवान शिव और भगवान विष्णु के हरिहर मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर, श्रीनगर स्थित पौराणिक कमलेश्वर महादेव मंदिर में एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जो धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। 4 नवंबर से 10 नवंबर तक चलने वाले मेले का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वर्चुअल रूप से संबोधित कर उद्घाटन किया ।
पौराणिक महत्व और कथा :
मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान विष्णु ने काशी में भगवान शिव की एक हजार कमलों से पूजा करने का संकल्प लिया था। जब एक कमल कम पड़ गया, तो भगवान विष्णु ने अपनी एक आँख शिव को अर्पित करने का विचार किया। भगवान शिव, विष्णु की इस भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया, साथ ही बैकुंठ धाम जाने का मार्ग भी प्रशस्त किया। तभी से इस तिथि को बैकुंठ चतुर्दशी के रूप में मनाया जाने लगा और इस स्थान का नाम कमलेश्वर महादेव पड़ा।
खडा़ दिया अनुष्ठान:
श्रीनगर के कमलेश्वर मंदिर में बैकुंठ चतुर्दशी का मुख्य आकर्षण ‘खड़ा दीया’ अनुष्ठान है। यह अनुष्ठान करने वाले लोग मेले में विशेष रूप से शामिल होते हैं। वे पूरी रात हाथ में जलता हुआ दीपक लेकर खड़े रहकर भगवान से प्रार्थना करते हैं। यह एक कठिन तपस्या है, जिसके बारे में दृढ़ विश्वास है कि भगवान शिव और विष्णु के आशीर्वाद से उनकी मनोकामना पूरी होती है। इस वर्ष होने वाले खड़ा दिया अनुष्ठान में प्रथम दिन 232 दंपतियों ने अपना पंजीकरण कराया है।
मेले का स्वरूप
बैकुंठ चतुर्दशी का मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक बड़ा सांस्कृतिक आयोजन भी है। यह मेला कई दिनों तक चलता है और इसमें स्थानीय हस्तशिल्प, कला और संस्कृति को बढ़ावा देने वाली प्रदर्शनियाँ भी लगाई जाती हैं। अलकनंदा नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस मेले में हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं। स्थानीय प्रशासन और सरकार भी इस मेले के आयोजन में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, इसे एक भव्य और सुरक्षित आयोजन बनाने का प्रयास करते हैं।
यह मेला सामुदायिक एकता और उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक विरासत के संरक्षण का प्रतीक है, जो हर साल भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

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